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श्री विद्या शोध पत्र सामग्री

 ## **शोध प्रबंध: श्रीविद्या साधना में कुंडलिनी विज्ञान: ललितासहस्रनाम और सौंदर्य लहरी के परिप्रेक्ष्य में** 


### **सारांश:** 
इसमें शोध के उद्देश्य, विषय के महत्व और प्राप्त निष्कर्षों का विस्तृत विवरण होगा। (लगभग 3-5 पृष्ठ) 

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## **अध्याय 1: प्रस्तावना** 
1.1 शोध विषय का परिचय। 
1.2 श्रीविद्या साधना और कुंडलिनी विज्ञान का महत्व। 
1.3 भारतीय परंपरा में श्रीविद्या और तंत्र का योगदान। 
1.4 ललितासहस्रनाम और सौंदर्य लहरी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि। 
1.5 शोध के उद्देश्य, उपादेयता और सीमा। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 20 पृष्ठ 

---

## **अध्याय 2: कुंडलिनी विज्ञान का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य** 
2.1 कुंडलिनी शक्ति: परिभाषा और स्वरूप। 
2.2 वैदिक और तांत्रिक ग्रंथों में कुंडलिनी का उल्लेख। 
2.3 चक्र और नाड़ी तंत्र का गहन विश्लेषण। 
2.4 कुंडलिनी जागरण: साधना प्रक्रिया और परिणाम। 
2.5 आधुनिक विज्ञान और कुंडलिनी। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 30 पृष्ठ 

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## **अध्याय 3: ललितासहस्रनाम में कुंडलिनी विज्ञान** 
3.1 ललितासहस्रनाम का साहित्यिक और दार्शनिक महत्व। 
3.2 कुंडलिनी से संबंधित नामों का गहन अध्ययन: 
   - मूलाधारैक-निलया 
   - सहस्रारांबुजारूढ़ा 
   - शक्तिचक्रप्रभेदिनी 
3.3 साधना और कुंडलिनी जागरण के क्रमिक चरण। 
3.4 ललितासहस्रनाम का साधक के जीवन पर प्रभाव। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 50 पृष्ठ 

---

## **अध्याय 4: सौंदर्य लहरी में कुंडलिनी विज्ञान** 
4.1 सौंदर्य लहरी की संरचना और रचनाकार। 
4.2 कुंडलिनी और त्रिपुरसुंदरी के सौंदर्य लहरी में चित्रण। 
4.3 कुंडलिनी जागरण के दौरान साधक के अनुभव और अवस्था। 
4.4 सौंदर्य लहरी के श्लोकों का व्याख्या सहित विश्लेषण। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 50 पृष्ठ 

---

## **अध्याय 5: श्रीविद्या साधना में कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया** 
5.1 श्रीचक्र और कुंडलिनी का संबंध। 
5.2 साधना के चरण: 
   - मंत्र जप 
   - ध्यान 
   - यंत्र पूजा 
   - नित्य पूजन विधि 
5.3 कुंडलिनी जागरण के दौरान साधक में होने वाले आंतरिक परिवर्तन। 
5.4 श्रीविद्या साधना के वैज्ञानिक पहलू। 
5.5 समकालीन संदर्भ में श्रीविद्या साधना। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 60 पृष्ठ 

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## **अध्याय 6: तांत्रिक और आधुनिक संदर्भ** 
6.1 कुंडलिनी साधना का तांत्रिक दृष्टिकोण। 
6.2 आधुनिक मनोविज्ञान और कुंडलिनी। 
6.3 कुंडलिनी जागरण और ऊर्जा चिकित्सा। 
6.4 श्रीविद्या साधना का आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 40 पृष्ठ 

---

## **अध्याय 7: निष्कर्ष और सुझाव** 
7.1 शोध निष्कर्ष। 
7.2 ललितासहस्रनाम और सौंदर्य लहरी के संदर्भ में कुंडलिनी विज्ञान का महत्व। 
7.3 भविष्य के शोध के लिए सुझाव। 
7.4 समग्र निष्कर्ष। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 20 पृष्ठ 

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# **शोध प्रबंध: श्रीविद्या साधना में कुंडलिनी विज्ञान – ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी के परिप्रेक्ष्य में** 

## **सारांश** 

### **1. प्रस्तावना** 
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में श्रीविद्या साधना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह एक गूढ़ तांत्रिक तथा उपासना पद्धति है, जिसमें भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी की आराधना मुख्य रूप से की जाती है। श्रीविद्या के अंतर्गत कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जिसे साधक अपनी साधना के माध्यम से आत्मानुभूति तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने हेतु अपनाते हैं। इस शोध में **"ललितासहस्रनाम"** और **"सौंदर्यलहरी"** जैसे अद्वितीय ग्रंथों के आधार पर श्रीविद्या साधना में कुंडलिनी विज्ञान के रहस्यों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। 

### **2. शोध की आवश्यकता एवं उद्देश्य** 
इस शोध का उद्देश्य श्रीविद्या साधना और कुंडलिनी विज्ञान के पारस्परिक संबंधों की गहराई से जांच करना है। विशेष रूप से **"ललितासहस्रनाम"** और **"सौंदर्यलहरी"** में वर्णित योग, तंत्र, और शक्ति साधना के विभिन्न आयामों का अध्ययन कर, यह स्पष्ट करना है कि किस प्रकार ये ग्रंथ कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया में सहायक सिद्ध होते हैं। 

मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं: 
1. **श्रीविद्या साधना की तांत्रिक एवं वेदांत दृष्टि से समीक्षा।** 
2. **ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी में उल्लिखित कुंडलिनी विज्ञान का विश्लेषण।** 
3. **श्रीचक्र की अवधारणा और उसकी कुंडलिनी जागरण में भूमिका।** 
4. **आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कुंडलिनी साधना की प्रासंगिकता एवं प्रभाव।** 

### **3. शोध की पद्धति** 
इस शोध में तुलनात्मक, दार्शनिक और व्याख्यात्मक पद्धतियों का प्रयोग किया गया है। विभिन्न ग्रंथों, शोध पत्रों, तांत्रिक ग्रंथों तथा योग साधकों के अनुभवों का अध्ययन कर इस विषय के गूढ़ पहलुओं को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। 

### **4. श्रीविद्या साधना एवं कुंडलिनी विज्ञान का परिचय** 
श्रीविद्या साधना में **श्रीचक्र** (श्री यंत्र) की साधना मुख्य मानी जाती है। यह तांत्रिक प्रक्रिया **महाशक्ति ललिता त्रिपुरसुंदरी** की उपासना से जुड़ी हुई है, जिसमें कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर सहस्रार चक्र तक ले जाया जाता है। 

**कुंडलिनी विज्ञान** योग एवं तंत्र का एक महत्वपूर्ण विषय है, जिसमें यह माना जाता है कि मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में स्थित शक्ति जब जाग्रत होती है, तो यह क्रमशः अन्य चक्रों को पार करते हुए सहस्रार चक्र तक पहुँचती है, जहाँ शिव-शक्ति का मिलन होता है। इस स्थिति को आत्मसाक्षात्कार एवं मोक्ष प्राप्ति की अवस्था कहा जाता है। 

### **5. ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी में कुंडलिनी विज्ञान** 
**(i) ललितासहस्रनाम:** यह ग्रंथ देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी के एक हजार नामों का संग्रह है, जिसमें श्रीविद्या के रहस्यों को संकेतों के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसमें देवी को "कुंडलिनी" (कुंडलिनी: 110 नाम), "श्रीचक्रराजनिलया" (श्रीचक्र में स्थित), और "सहस्रारांबुजारूढा" (सहस्रार कमल में स्थित) के रूप में वर्णित किया गया है, जो कुंडलिनी जागरण की अवस्था का ही संकेत करता है। 

**(ii) सौंदर्यलहरी:** आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह ग्रंथ देवी उपासना और कुंडलिनी जागरण के गूढ़ रहस्यों को प्रकट करता है। इसके प्रथम 41 श्लोकों को "आनंदलहरी" कहा जाता है, जो तांत्रिक दृष्टि से श्रीविद्या साधना एवं कुंडलिनी शक्ति के जागरण की विधियों को प्रकट करता है। 

इस ग्रंथ में **शक्ति की यात्रा मूलाधार से सहस्रार तक** विभिन्न चक्रों के माध्यम से होती है, जिसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। उदाहरणार्थ: 
- **"चतुरश्रं तत् स्वस्थं शिवयुवतिभिस्सेवितमति:"** 
  (श्रीचक्र के केंद्र में स्थित महाशक्ति का वर्णन) 

- **"त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुम्..."** 
  (देवी की दिव्य ज्योति एवं कुंडलिनी रूपी प्रभाव का उल्लेख) 

### **6. कुंडलिनी जागरण में श्रीचक्र की भूमिका** 
श्रीचक्र को शक्ति उपासना का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। यह नौ आवरणों (नवावरण) में विभाजित होता है, जो मानव के नौ स्तरों (सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण सहित) को दर्शाता है। कुंडलिनी जागरण के दौरान साधक जब विभिन्न चक्रों को पार करता है, तो यह यात्रा श्रीचक्र की संरचना से मेल खाती है। 

### **7. आधुनिक युग में कुंडलिनी साधना की प्रासंगिकता** 
आधुनिक वैज्ञानिक शोधों में यह प्रमाणित हो चुका है कि कुंडलिनी जागरण का प्रभाव मस्तिष्क की तंत्रिका संरचना (Neural System) पर पड़ता है। इसके माध्यम से मानसिक शांति, एकाग्रता, उच्चतर चेतना तथा आध्यात्मिक जागरण संभव है। 

आज के तनावपूर्ण जीवन में श्रीविद्या एवं कुंडलिनी साधना की महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है, क्योंकि यह न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी सिद्ध होती है। 

### **8. निष्कर्ष** 
यह शोध स्पष्ट करता है कि श्रीविद्या साधना एवं कुंडलिनी विज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। **ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी** में वर्णित सिद्धांत न केवल आध्यात्मिक साधकों के लिए उपयोगी हैं, बल्कि आधुनिक विज्ञान भी इनके प्रभावों को स्वीकार करने लगा है। 

श्रीचक्र एवं कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया न केवल साधक को आत्मबोध की दिशा में प्रेरित करती है, बल्कि जीवन को संतुलित और ऊर्जावान बनाती है। यह शोध कुंडलिनी विज्ञान एवं श्रीविद्या साधना के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करने में सहायक सिद्ध होगा और आध्यात्मिक अन्वेषकों के लिए नए दृष्टिकोण प्रस्तुत करेगा। 

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**इस शोध का निष्कर्ष यह है कि श्रीविद्या साधना में कुंडलिनी जागरण का महत्वपूर्ण स्थान है, जिसे ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी में गूढ़ रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन ग्रंथों का अध्ययन न केवल आध्यात्मिक जागृति प्रदान करता है, बल्कि आत्म-साक्षात्कार की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन भी करता है।**






## **संदर्भ सूची और परिशिष्ट** 
- संदर्भ ग्रंथों और शोध पत्रों की विस्तृत सूची। 
- ललितासहस्रनाम और सौंदर्य लहरी के अंश। 
- उपयोग किए गए चित्र, चार्ट और अन्य सामग्री। 

**पृष्ठ संख्या:** लगभग 30 पृष्ठ 

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### **संदर्भ पुस्तकें:** 
1. ललितासहस्रनाम (विभिन्न टीकाएँ) 
2. सौंदर्य लहरी - आदि शंकराचार्य 
3. कुंडलिनी: द मदर ऑफ यूनिवर्स - लक्ष्मण झूला 
4. द सेक्रेड पावर ऑफ कुंडलिनी - स्वामी सत्यानंद सरस्वती 
5. तांत्रिक परंपरा और साधना - आचार्य रजनीश (ओशो) 
6. श्रीविद्या रहस्य - स्वामी करपात्री जी 
7. चक्र और ऊर्जा विज्ञान - अन्ना वाइज 


# **अध्याय 1: प्रस्तावना** 

## **1.1 शोध विषय का परिचय** 

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में श्रीविद्या साधना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यह न केवल एक उपासना पद्धति है, बल्कि आत्मबोध और ब्रह्मज्ञान प्राप्ति का एक रहस्यमय विज्ञान भी है। श्रीविद्या का मूल तांत्रिक ग्रंथों में गहराई से वर्णन मिलता है, और यह संपूर्ण शक्ति-साधना की पराकाष्ठा मानी जाती है। 

श्रीविद्या साधना का संबंध त्रिपुरा सिद्धांत से है, जिसमें देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी को समस्त ब्रह्मांड की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। इस साधना का गहन संबंध **श्रीचक्र** एवं **कुंडलिनी जागरण** से है। श्रीचक्र को सृष्टि की ऊर्जा संरचना का प्रतीक माना जाता है, जिसमें समस्त चक्रों का समावेश है। 

कुंडलिनी जागरण भारतीय योग परंपरा का एक महत्वपूर्ण आयाम है, जिसे विभिन्न तांत्रिक एवं योग ग्रंथों में विशेष स्थान दिया गया है। यह माना जाता है कि कुंडलिनी मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में रहती है और जब यह सहस्रार चक्र तक पहुंचती है, तो साधक परम चेतना की अनुभूति करता है। इस शोध का उद्देश्य **ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी** के माध्यम से श्रीविद्या साधना में कुंडलिनी विज्ञान के महत्व को स्पष्ट करना है। 

## **1.2 श्रीविद्या साधना और कुंडलिनी विज्ञान का महत्व** 

### **1.2.1 श्रीविद्या साधना का महत्व** 
श्रीविद्या साधना केवल एक साधना नहीं, बल्कि एक संपूर्ण जीवनदर्शन है। इसमें देवी ललिता त्रिपुरसुंदरी की उपासना द्वारा आत्मबोध और अद्वैत दर्शन को प्राप्त करने की विधियां वर्णित हैं। यह साधना सात्विक तांत्रिक पद्धति का उच्चतम स्तर मानी जाती है। 

श्रीविद्या साधना के मुख्य अंग हैं: 
1. **मंत्र साधना** – पंचदशी, षोडशी, त्रैलोक्यमोहन मंत्र आदि। 
2. **यंत्र साधना** – श्रीचक्र आराधना। 
3. **कुंडलिनी जागरण** – चक्रों की शुद्धि और शक्ति का जागरण। 
4. **न्याश एवं ध्यान** – शरीर को शक्ति का मंदिर मानकर चेतना को विकसित करना। 

### **1.2.2 कुंडलिनी विज्ञान का महत्व** 
कुंडलिनी जागरण भारतीय योग एवं तंत्र शास्त्र का एक गूढ़ विषय है। यह मानव के भीतर स्थित सुप्त शक्ति को जागृत कर उसे आत्मबोध की ओर ले जाता है। कुंडलिनी जागरण से व्यक्ति की चेतना विकसित होती है और वह ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकता है। 

कुंडलिनी विज्ञान के प्रमुख अंग: 
1. **षट्चक्र साधना** – मूलाधार से सहस्रार तक स्थित छह चक्रों का जागरण। 
2. **नाड़ी शुद्धि** – इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी को शुद्ध करना। 
3. **मंत्र शक्ति** – बीज मंत्रों द्वारा कुंडलिनी को जागृत करना। 
4. **योग साधना** – प्राणायाम, मुद्रा और ध्यान द्वारा उन्नति प्राप्त करना। 

श्रीविद्या साधना में कुंडलिनी विज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि यह देवी की शक्ति के रूप में साधक को आत्मानुभूति प्रदान करता है। 

## **1.3 भारतीय परंपरा में श्रीविद्या और तंत्र का योगदान** 

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में श्रीविद्या और तंत्र का विशेष स्थान है। तंत्र शास्त्र वेदों और उपनिषदों की गूढ़ रहस्यमयी शिक्षाओं को व्यावहारिक रूप से समझाने का कार्य करता है। तंत्र ग्रंथों में **शक्ति साधना**, **कुंडलिनी जागरण**, **नाड़ी तंत्र**, **चक्र प्रणाली**, और **योग विधियां** विस्तृत रूप से वर्णित हैं। 

श्रीविद्या साधना का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जैसे: 
1. **रुद्रयामल तंत्र** – इसमें श्रीविद्या की आधारभूत साधना दी गई है। 
2. **पाराशर तंत्र** – श्रीचक्र की उत्पत्ति और उसकी साधना का वर्णन। 
3. **तंत्रसार** – इसमें श्रीविद्या की विस्तृत प्रक्रिया दी गई है। 
4. **योगिनीहृदयम्** – श्रीचक्र और कुंडलिनी के संबंध का वर्णन। 

तंत्र ग्रंथों में कुंडलिनी शक्ति को आत्मज्ञान की कुंजी माना गया है। इस परंपरा में योग और तंत्र को एक साथ जोड़कर गूढ़ सिद्धांतों को स्पष्ट किया गया है। 

## **1.4 ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि** 

### **1.4.1 ललितासहस्रनाम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि** 
**ललितासहस्रनाम** देवी उपासना का एक महान ग्रंथ है, जो **ब्रह्मांड पुराण** के अंतर्गत वर्णित है। इसमें भगवती ललिता त्रिपुरसुंदरी के 1000 दिव्य नामों का संग्रह है। इन नामों में देवी के विभिन्न रूपों, शक्तियों और साधना प्रक्रियाओं का वर्णन मिलता है। 

इस ग्रंथ की विशेषताएँ: 
- देवी को **कुंडलिनी रूप में वर्णित किया गया है।** 
- इसमें **श्रीचक्र की साधना का वर्णन** है। 
- देवी को **योग और तंत्र की अधिष्ठात्री शक्ति** कहा गया है। 

### **1.4.2 सौंदर्यलहरी की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि** 
**सौंदर्यलहरी** आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अद्वितीय ग्रंथ है। यह केवल देवी उपासना का ग्रंथ नहीं, बल्कि श्रीविद्या और कुंडलिनी साधना का भी मार्गदर्शक है। 

इस ग्रंथ के दो भाग हैं: 
1. **आनंदलहरी (प्रथम 41 श्लोक)** – कुंडलिनी जागरण एवं श्रीविद्या साधना का वर्णन। 
2. **सौंदर्यलहरी (अगले 59 श्लोक)** – देवी की सौंदर्य महिमा का वर्णन। 

इस ग्रंथ में: 
- कुंडलिनी शक्ति को देवी का स्वरूप बताया गया है। 
- श्रीचक्र साधना की रहस्यमयी विधियों को बताया गया है। 

## **1.5 शोध के उद्देश्य, उपादेयता और सीमा** 

### **1.5.1 शोध के उद्देश्य** 
इस शोध का मुख्य उद्देश्य श्रीविद्या साधना और कुंडलिनी विज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन करना है। विशेष रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर शोध केंद्रित है: 
1. **श्रीविद्या साधना और कुंडलिनी जागरण का परस्पर संबंध।** 
2. **ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी में कुंडलिनी के रहस्यों का विश्लेषण।** 
3. **श्रीचक्र साधना और कुंडलिनी विज्ञान का तुलनात्मक अध्ययन।** 
4. **आधुनिक विज्ञान में कुंडलिनी जागरण की प्रासंगिकता।** 

### **1.5.2 शोध की उपादेयता** 
यह शोध तांत्रिक ग्रंथों के आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक अध्ययन में रुचि रखने वाले शोधार्थियों, योगियों, तांत्रिकों और आध्यात्मिक जिज्ञासुओं के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। 

### **1.5.3 शोध की सीमा** 
इस शोध में केवल **ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी** के आधार पर श्रीविद्या एवं कुंडलिनी विज्ञान का अध्ययन किया गया है। अन्य तांत्रिक ग्रंथों का केवल संदर्भ रूप में उल्लेख किया गया है। 

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**अतः यह अध्याय स्पष्ट करता है कि श्रीविद्या साधना और कुंडलिनी विज्ञान भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के प्रमुख अंग हैं। ललितासहस्रनाम और सौंदर्यलहरी इन दोनों विषयों के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करते हैं, जिनका यह शोध व्यापक विश्लेषण करेगा।**



### **अध्याय 2: कुंडलिनी विज्ञान का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य** 

## **2.1 कुंडलिनी शक्ति: परिभाषा और स्वरूप** 

### **परिचय** 
कुंडलिनी शक्ति एक अद्भुत और रहस्यमयी आध्यात्मिक ऊर्जा है, जिसे भारतीय योग और तांत्रिक परंपराओं में विशेष स्थान दिया गया है। यह शक्ति प्रत्येक व्यक्ति के भीतर सुप्त अवस्था में रहती है और उपयुक्त साधना द्वारा इसे जाग्रत किया जा सकता है। 

### **परिभाषा** 
संस्कृत में 'कुंडलिनी' शब्द 'कुंडल' से बना है, जिसका अर्थ है कुंडली की तरह लिपटी हुई। इसे ‘शक्ति’ या ‘प्राण ऊर्जा’ के रूप में वर्णित किया गया है, जो मूलाधार चक्र में सर्पिणी के समान तीन और आधे फेरे में लिपटी हुई रहती है। 

### **स्वरूप** 
कुंडलिनी को एक दिव्य शक्ति के रूप में देखा जाता है, जो साधक के अंदर सुप्त रहती है और उचित योग-साधना से सक्रिय होकर आत्मबोध तथा चैतन्य की उच्चतम अवस्था तक ले जाती है। इसके स्वरूप को शास्त्रों में इस प्रकार बताया गया है— 
- **सर्पाकार**: यह मूलाधार चक्र में सर्प की भाँति कुंडली मारकर स्थित रहती है। 
- **शक्ति तत्व**: यह परमात्मा की सृजनात्मक शक्ति का प्रतीक है। 
- **चेतना शक्ति**: इसे जागृत करने पर व्यक्ति उच्च आध्यात्मिक स्तर पर पहुँच सकता है। 

## **2.2 वैदिक और तांत्रिक ग्रंथों में कुंडलिनी का उल्लेख** 

### **वैदिक ग्रंथों में कुंडलिनी** 
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में कुंडलिनी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वर्णन मिलता है।  
- ऋग्वेद में इसे 'सर्पिणी' कहा गया है। 
- यजुर्वेद में इसे 'ऊर्ध्वरेता' शक्ति कहा गया है, जो व्यक्ति को आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाती है। 
- सामवेद में इसे 'ब्रह्मतेज' के रूप में दर्शाया गया है। 
- अथर्ववेद में इसे 'ध्यानयोग' के माध्यम से जागृत करने की विधि बताई गई है। 

### **उपनिषदों में कुंडलिनी** 
- **श्वेताश्वतर उपनिषद** में इसे ईश्वर प्राप्ति का माध्यम कहा गया है। 
- **योगतत्त्व उपनिषद** में इसे सुप्त शक्ति बताते हुए इसे जागृत करने की विधियाँ दी गई हैं। 

### **तांत्रिक ग्रंथों में कुंडलिनी** 
- **शक्तिपात तंत्र** में कुंडलिनी को सर्वोच्च आध्यात्मिक जागरण की कुंजी कहा गया है। 
- **गोरक्ष संहिता** और **हठयोग प्रदीपिका** में इसे योग साधना का प्रमुख अंग माना गया है। 
- **श्रीविद्या तंत्र** में इसे त्रिपुरसुंदरी की शक्ति कहा गया है, जो चक्रों को पार कर सहस्रार में विलीन होती है। 

## **2.3 चक्र और नाड़ी तंत्र का गहन विश्लेषण** 

### **चक्र तंत्र** 
कुंडलिनी जागरण के लिए चक्रों का गहन अध्ययन आवश्यक है। योग और तंत्र ग्रंथों में शरीर में सात प्रमुख चक्रों का उल्लेख है— 

1. **मूलाधार चक्र**: कुंडलिनी यहीं सुप्त अवस्था में रहती है। 
2. **स्वाधिष्ठान चक्र**: रचनात्मकता और भावनाओं से जुड़ा होता है। 
3. **मणिपूर चक्र**: शक्ति और इच्छाशक्ति से संबंधित है। 
4. **अनाहत चक्र**: प्रेम और करुणा का केंद्र है। 
5. **विशुद्ध चक्र**: संचार और उच्च अभिव्यक्ति का स्रोत। 
6. **आज्ञा चक्र**: अंतर्ज्ञान और दिव्य दृष्टि से जुड़ा हुआ है। 
7. **सहस्रार चक्र**: परमात्मा से एकत्

NCERT  Class 7 Hindi Chapter  ek tinka

हिन्दी (वसंत)
कक्षा - 7

एक तिनका

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास 
कविता से
प्रश्न 1.
नीचे दी गई कविता की पंक्तियों को सामान्य वाक्य में बदलिए।
जैसे-एक तिनका आँख में मेरी पड़ा – मेरी आँख में एक तिनका का पड़ा।
मुँठ देने लोग कपड़े की लगे – लोग कपड़े की मँठ देने लगे।
(क) एक दिन जब था मुंडेरे पर खड़ा – ………
(ख) लाल होकर भी दुखने लगी – ………..
(ग) ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भागी – ………
(घ) जब किसी दब से निकल तिनका गया। – ………
उत्तर-
(क) एक दिन जब मुंडेरे पर खड़ा था।
(ख) आँख लाल होकर दुखने लगी।
(ग) बेचारी ऐंठ दबे पाँवों भगी।
(घ) किसी ने ढब से तिनका निकाला।

प्रश्न 2.
‘एक तिनका’ कविता में किस घटना की चर्चा की गई है, जिससे घमंड नहीं करने का संदेश मिलता है?
उत्तर-
इस कविता में उस घटना का वर्णन किया गया है जब कवि की आँख में एक तिनका गिर गया। उस तिनके से काफ़ी बेचैन हो उठा। उसका सारा घमंड चूर हो जाता है। किसी तरह लोग कपड़े की नोक से उनकी आँखों में पड़ा तिनका निकालते हैं तो कवि सोच में पड़ जाता है कि आखिर उसे किस बात का घमंड था, जो एक तिनके ने उनके घमंड को जमीन पर लाकर खड़ा कर दिया। इससे यह संदेश मिलता है कि व्यक्ति को स्वयं पर घमंड नहीं करना चाहिए।


प्रश्न 3.
आँख में तिनका पड़ने के बाद घमंडी की क्या दशा हुई ?
उत्तर-
घमंडी की आँख में तिनका पड़ने पर उसकी आँख लाल होकर दुखने लगी। वह बेचैन हो गया और उसका सारा ऐंठ समाप्त हो गया।

प्रश्न 4.
घमंडी की आँख से तिनका निकालने के लिए उसके आसपास लोगों ने क्या किया?
उत्तर
घमंडी की आँख से तिनका निकालने के लिए उसके आसपास के लोगों ने कपड़े की मुँठ बनाकर उसकी आँख में डाली।

प्रश्न 5.
‘एक तिनका’ कविता में घमंडी को उसकी ‘समझ’ ने चेतावनी दी
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।
इसी प्रकार की चेतावनी कबीर ने भी दी है
तिनका कब हूँ न निदिए पाँव तले जो होय।।
कबहूँ उड़ि आँखिन परै, पीर घनेरी होय॥
• इन दोनों में क्या समानता है और क्या अंतर? लिखिए।
उत्तर-
(क) उपर्युक्त काव्यांश के माध्यम से कवि ने यह संदेश दिया है कि अहंकार नहीं करना चाहिए। क्योंकि एक छोटा-सा तिनका भी अगर आँख में पड़ जाए तो मनुष्य को बेचैन कर देता है।
(ख) इन दोनों काव्यांशों की पंक्तियों में अंतर-दोनों काव्यांशों में अंतर यह है कि हरिऔध जी द्वारा लिखी पंक्तियों में किसी प्रकार के अहंकार से दूर रहने की चेतावनी दी गई है, क्योंकि एक तिनका भी हमारे अहंकार को चूर कर सकता है। छोटे-से छोटे वस्तु का अपना महत्त्व होता है। दोनों में घमंड से बचने की शिक्षा दी गई है।

अनुमान और कल्पना

प्रश्न 1.
इस कविता को कवि ने ‘मैं’ से आरंभ किया है- ‘मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ’। कवि का यह ‘मैं’ कविता पढ़ने वाले व्यक्ति से भी जुड़ सकता है और तब अनुभव यह होगा कि कविता पढ़ने वाला व्यक्ति अपनी बात बता रहा है। यदि कविता में ‘मैं’ की जगह ‘वह’ या कोई नाम लिख दिया जाए, तब कविता के वाक्यों में बदलाव की जाएगा। कविता में ‘मैं’ के स्थान पर ‘वह’ या कोई नाम लिखकर वाक्यों के बदलाव को देखिए और कक्षा में पढ़कर सुनाइए।
उत्तर-
वह घमंडों में भरा ऐंठा हुआ।
एक दिन जब था मुँडेर पर खड़ा
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ,
एक तिनका आँख में उसकी पड़ा
वह झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूठ देने लोग कपड़े की लगे,
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।।
जब किसी ढब से निकल तिनका गया,
तब उसकी ‘समझ’ ने यों उसे ताने दिए।
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा,
एक तिनका है बहुत तेरे लिए।

प्रश्न 2.
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए-
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी,
तब ‘समझ’ ने यों मुझे ताने दिए।
• इन पंक्तियों में ऐंठ’ और ‘समझ’ शब्दों का प्रयोग सजीव प्राणी की भाँति हुआ है। कल्पना कीजिए, यदि ‘ऐंठ’ और ‘समझ’ किसी नाटक में दो पात्र होते तो उनको अभिनय कैसा होता?
उत्तर -
ऐंठ और समझ
समझ-ऐंठ! इतना ऐंठती क्यों हो?
ऐंठ-समझ! यह तेरी समझ से बाहर की बात है।
समझ-ऐसी कौन-सी बात है जो मेरी समझ में नहीं आती।
ऐंठ-समझ तेरी समझ में यह नहीं आता कि यदि मनुष्य सुंदर हो, धनवान हो, समाज में ऊँचा स्थान रखता हो तो उसे अपने ऊपर घमंड आ ही जाता है।
समझ-नहीं! ऐंठ, कभी घमंड नहीं करना चाहिए क्योंकि यह सब तो क्षणभंगुर है कभी भी नष्ट हो सकता है। लेकिन मनुष्य की विनम्रता उसकी परोपकार की भावना व हँसमुख स्वभाव कभी नष्ट नहीं होता।
(इतने में ऐंठ की आँख में एक तिनका उड़कर पड़ गया।)
समझ–ऐंठ। इतना तिलमिला क्यों रही हो?
ऐंठ-न जाने कहाँ से आँख में तिनका आकर पड़ गया है। मैं तो बहुत बेचैन हो रही हूँ ।
समझ-अब तुम्हारी घमंड कहाँ गया? एक छोटे से तिनके से तिलमिला उठीं।
ऐंठ-मुझे क्षमा करो ‘समझ’। अब मैं कभी अपने पर घमंड नहीं करूंगी।


प्रश्न 3.
नीचे दी गई कबीर की पंक्तियों में तिनका शब्द का प्रयोग एक से अधिक बार किया गया है। इनके अलग-अलग अर्थों की जानकारी प्राप्त करें।
उठा बबूला प्रेम का, तिनका उड़ा अकास।
तिनका-तिनका हो गया, तिनका तिनके पास॥
उत्तर-
जिस प्रकार के झोंके से उड़कर तिनके आसमान में चले जाते हैं और सभी तिनके बिखर जाते हैं उसी प्रकार ईश्वर के प्रेम में लीन हृदय सांसारिक मोह-माया से मुक्त होकर ऊपर उठ जाता है। वह आत्मा का परिचय प्राप्त कर परमात्मा से मिल जाता है, यानी उसे अपने अस्तित्व की पहचान हो जाती है और सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्त होकर ईश्वर के करीब पहुँच जाता है। यानी आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है।

भाषा की बात

* ‘किसी ढब से निकलना’ का अर्थ है किसी ढंग से निकलना। ‘ढब से’ जैसे कई वाक्यांशों से आप परिचित होंगे, जैसे-धम से वाक्यांश है लेकिन ध्वनियों में समानता होने के बाद भी ढब से और धर्म से जैसे वाक्यांशों के प्रयोग में अंतर है। ‘धम से’, ‘छप से’ इत्यादि का प्रयोग ध्वनि द्वारा क्रिया को सूचित करने के लिए किया जाता है। नीचे कुछ ध्वनि द्वारा क्रियों को सूचित करने वाले वाक्यांश और कुछ अधूरे वाक्य दिए गए हैं। उचित वाक्यांश चुनकर वाक्यों के खाली स्थान भरिए-
छप से
टप से
थर्र से
फुर्र से
सन् से।
(क)मेंढक पानी में …………….. कूद गया।
(ख)नल बंद होने के बाद पानी की एक बूंद …………………….. च गई।
(ग)शोर होते ही चिड़िया ………………….. उड़ी।
(घ) ठंडी हवा ……………………. गुजरी, मैं ठंड में …………………….. काँप गया।

उत्तर-
मेंढक पानी में छप से कूद गया।
नल बंद होने के बाद पानी की एक बूंद टप से चू गई।
शोर होते ही चिड़िया फुर्र से उड़ी।
ठंडी हवा सन् से गुजरी, मैं ठंड में थर्र से काँप गया।

NCERT Solutions for Class 7 Hindi Chapter १०   भोर और बरखा 

हिन्दी (वसंत)
कक्षा - 7
अध्याय - १०

भोर और बरखा 

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
कविता से

प्रश्न 1.
‘बंसीवारे ललना’ ‘मोरे प्यारे लाल जी’ कहते हुए, यशोदा किसे जगाने का प्रयास करती हैं और कौन-कौन-सी बातें कहती हैं?
उत्तर-
‘बंसीवारे ललना’ ‘मोरे प्यारे’ व ‘लाल जी’ कहते हुए यशोदा श्रीकृष्ण को जगाने का प्रयास कर रही हैं। वह उनसे कहती हैं कि मेरे लाल जागो, रात बीत गई है, सुबह हो गई है। सबके घरों के दरवाजे खुल गए हैं। गोपियाँ दही बिलो रही हैं। और तुम्हारे खाने के लिए मनभावन मक्खन निकाल रही हैं। तुम्हें जगाने के लिए सभी देव और मानव खड़े हैं जो तुम्हारे दर्शनों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तुम्हारे सखा, ग्वाल-बाल तुम्हारी जय-जयकार कर रहे हैं। अतः तुम अब उठ जाओ।

प्रश्न 2
नीचे दी गई पंक्ति का आशय अपने शब्दों में लिखिए- ‘माखन-रोटी हाथ मँह लिनी, गउवन के रखवारे।’
उत्तर- 
गायों की रखवाली करने वाले तुम्हारे मित्र ग्वालवालों ने रोटी और मक्खन लिया हुआ है। वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हे कृष्ण उठो और जाओ।

प्रश्न 3.
पढ़े हुए पद के आधार पर ब्रज की भोर का वर्णन कीजिए।
उत्तर
ब्रज में भोर होते ही ग्वालनें घर-घर में दही बिलौने लगती हैं, उनकी चूड़ियों की मधुर झंकार वातावरण में गूंजने लगती है, घर-घर में मंगलाचार होता है, ग्वाल-बाल गौओं को चराने के लिए वन में जाने की तैयारी करते हैं।

प्रश्न 4.
मीरा को सावन मनभावन क्यों लगने लगा?
उत्तर-
मीरा को सावन मनभावन इसलिए लगने लगा, क्योंकि सावन की फुहारें में मन में उमंग जगाने लगती हैं तथा श्रीकृष्ण के आने का आभास हो गया।

प्रश्न 5.
पाठ के आधार पर सावन की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
सावन के आते ही बादल चारों दिशाओं में उमड़-घुमड़कर विचरण करने लगते हैं। बिजली चमकने लगती है, वर्षा की नन्हीं-नन्हीं बूंदे बरसती हैं। शीतल हवाएँ बहने लगती हैं और मौसम सुहावने लगने लगते हैं।

कविता के आगे

प्रश्न 1.
मीरा भक्तिकाल की प्रसिद्ध कवयित्री थीं। इस काल के दूसरे कवियों के नामों की सूची बनाइए तथा उसकी एक एक रचना का नाम लिखिए।
उत्तर-
कबीरदास – बीजक
सूरदास – सूरसागर
तुलसीदास – रामचरितमानस
जायसी – पद्मावत

प्रश्न 2.
सावन वर्षा ऋतु का महीना है, वर्षा ऋतु से संबंधित दो अन्य महीनों के नाम लिखिए।
उत्तर
‘सावन’ वर्षा ऋतु का विशेष महीना माना जाता है लेकिन सावन से पहले के महीने आषाढ़ वे सावन के बाद के महीने भादों में भी कई बार वर्षा हो जाती है।

अनुमान और कल्पना

प्रश्न 1.
सुबह जगने के समय आपको क्या अच्छा लगता है?
उत्तर
सुबह जगने के समय मुझे अच्छा लगता है कि मेरी माँ मेरे सामने हो।

प्रश्न 2.
यदि आपको अपने छोटे भाई-बहन को जगाना पड़े, तो कैसे जगाएँगे?
उत्तर-
यदि हमें छोटे भाई-बहन को जगाना पड़े तो प्यार से उनके सिर और बालों को सहलाते हुए जगाएँगे।


प्रश्न 3.
वर्षा में भींगना और खेलनों आपको कैसा लगता है?
उत्तर-
वर्षा में भींगना और खेलना मुझे बहुत अच्छा लगता है।


प्रश्न 4.
मीरा बाई ने सुबह का चित्र खींचा है। अपनी कल्पना और अनुमान से लिखिए कि नीचे दिए गए स्थानों की सुबह कैसी होती है
(क) गाँव, गली या मुहल्ले में,
(ख) रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर
(ग) नदी या समुद्र के किनारे
(घ) पहाड़ों पर।
उत्तर-
(क) गाँवों में लोगों की चहल-पहल शुरू हो जाती है। गाँव में गायें रंभाने लगती हैं, पक्षी चहचहाने लगते हैं। कुछ लोग सुबह-सुबह मंदिर जाने लगते हैं, कई सैर पर जाते हैं। किसान हल लेकर खेतों पर जाने को तैयार हो जाते हैं।
(ख) रेलवे प्लेटफार्म पर सुबह-सुबह गाड़ी पकड़ने रेल का इंतजार करते दिखाई देते हैं। रेलवे स्टेशन पर गाड़ियों का आवागमन होने लगता है। सवारियाँ उतरती-चढ़ती रहती हैं, प्लेटफॉर्म पर सफ़ाई कर्मचारी झाड़ लगाते दिखाई देते हैं।
(ग) नदी या समुद्र के किनारे सुबह का वातावरण बिलकुल शांत होता है। उनमें जल धीमी गति से प्रवाहित होता रहता है। कुछ लोग सैर करते हुए दिखाई देते हैं।
(घ) पहाड़ों पर प्रातः लुभावनी लगती है। उगते हुए सूरज की किरणे अत्यंत मनोरम दृश्य उपस्थित करती हैं। मंद-मंद हवाएँ यहाँ चलती रहती हैं।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
कृष्ण को ‘गउवन के रखवारे’ कहा गया जिसका अर्थ है गौओं का पालन करनेवाले। इसके लिए एक शब्द दें
उत्तर-
गोपाला या गोपालक।

प्रश्न 2.
नीचे दो पंक्तियाँ दी गई हैं। इनमें से पहली पंक्ति में रेखांकित शब्द दो बार आए हैं, और दूसरी पंक्ति में भी दो बार। इन्हें पुनरुक्ति (पुनः उक्ति) कहते हैं। पहली पंक्ति में रेखांकित शब्द विशेषण हैं और दूसरी पंक्ति में संज्ञा।
‘नन्हीं-नन्हीं बूंदन मेहा बरसे’ ‘घर-घर खुले किंवारे’
• इस प्रकार के दो-दो उदाहरण खोजकर वाक्य में प्रयोग कीजिए और देखिए कि विशेषण तथा संज्ञा की पुनरुक्ति के अर्थ में क्या अंतर है?
जैसे–मीठी-मीठी बातें, फूल-फूल महके।
उत्तर
विशेषण पुनरुक्ति
गरम-गरम – माँ ने गरम-गरम पकौड़े बनाए।
तरह-तरह – बगीचे में तरह-तरह के फूल खिले थे।
सुंदर-सुंदर – रमा ने सुंदर-सुंदर साड़ियों का चुनाव कर लिया।
मीठे-मीठे – शबरी ने मीठे-मीठे बेर राम को खिलाए।
संज्ञा पुनरुक्ति
गली-गली – नेताओं ने गली-गली में प्रचार शुरू कर दिया।
गाँव-गाँव – सरकार ने गाँव-गाँव में कुएँ खुदवाने का प्रस्ताव जारी किया।
बच्चा-बच्चा – मुहल्ले का बच्चा-बच्चा यह बात जान गया कि मंदिर में चोरी पुजारी ने की है।
वन-वन – राम, लक्ष्मण और सीता वनवास के समय वन-वन भटकते रहे।

कुछ कहने को

प्रश्न 1.
कृष्ण को ‘गिरधर’ क्यों कहा जाता है? इसके पीछे कौन सी कथा है? पता कीजिए और कक्षा में बताइए।
उत्तर
कृष्ण को गिरधर कहा गया है क्योंकि उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली पर उठाया था अर्थात् गिरि को धारण करने वाले।

मूल्यपरक प्रश्न

प्रश्न 1.
मीरा और कृष्ण की भक्ति के बारे में पाँच वाक्य लिखिए।
उत्तर-
कवयित्री मीरा कृष्ण की परम भक्त थीं। वे कृष्ण को अपना पति मानकर भक्ति करती थीं। उन्होंने कृष्ण प्रेम के लिए घर द्वार को छोड़ दिया। वे घूम-घूमकर मंदिरों में कृष्ण भक्ति में लीन रहती थी। वह कृष्ण की अनन्य भक्त थी। इसके लिए उन्होंने संसार की लोक-लाज की भी परवाह नहीं की।

   

NCERT Solutions for Class 7 Hindi Chapter 9  खानपान की बदलती तस्वीर 

हिन्दी (वसंत)
कक्षा - 7
अध्याय - 9

खान-पान की बदलती तस्वीर 

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
निबंध से

प्रश्न 1.
खानपान की मिश्रित संस्कृति से लेखक का क्या मतलब है? अपने घर के उदाहरण देकर इसकी व्याख्या करें।
उत्तर-
खानपान की मिश्रित संस्कृति से लेखक का मतलब है- स्थानीय अन्य प्रांतों तथा विदेशी व्यंजनों के खानपान का आनंद उठाना यानी स्थानीय व्यंजनों के खाने-पकाने में रुचि रखना, उसकी गुणवत्ता तथा स्वाद को बनाए रखना। इसके अलावे अपने पसंद के आधार पर एक-दूसरे प्रांत को खाने की चीजों को अपने भोज्य पदार्थों में शामिल किया है। जैसे आज दक्षिण भारत के व्यंजन इडली-डोसा, साँभर इत्यादि उत्तर भारत में चाव से खाए जाते हैं और उत्तर भारत के ढाबे के व्यंजन सभी जगह पाए जाते हैं। यहाँ तक पश्चिमी सभ्यता का व्यंजन बर्गर, नूडल्स का चलन भी बहुत बढ़ा है। हमारे घर में उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय दोनों प्रकार के व्यंजन तैयार होते हैं। चूंकि, मैं उत्तर भारतीय हूँ । हमारा भोजन रोटी-चावल दाल है लेकिन इन व्यंजनों से ज्यादा इडली साँभर, चावल, चने-राजमा, पूरी, आलू, बर्गर अधिक पसंद किए जाते हैं। 
प्रश्न 2
खानपान में बदलाव के कौन से फ़ायदे हैं? फिर लेखक इस बदलाव को लेकर चिंतित क्यों है? 
उत्तर- 
खानपान में बदलाव से निम्न फ़ायदे हैं-
1.एक प्रदेश की संस्कृति का दूसरे प्रदेश की संस्कृति से मिलना।
2.राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलना।
3.जल्दी तैयार होने वाले विविध व्यंजनों की विधियाँ उपलब्ध होना।
4.बच्चों व बड़ों को मनचाहा भोजन मिलना।
5.देश-विदेश के व्यंजन मालूम होना।
खानपान में बदलाव से होने वाले फ़ायदों के बावजूद लेखक इस बदलाव को लेकर चिंतित है क्योंकि उसका मानना है कि आज खानपान की मिश्रित संस्कृति को अपनाने से नुकसान भी हो रहे हैं जो निम्न रूप से हैं-
1.स्थानीय व्यंजनों का चलन कम होता जा रहा है जिससे नई पीढी स्थानीय व्यंजनों के बारे में जानती ही नहीं।
2.खाद्य पदार्थों में शुद्धता की कमी होती जा रही है।
3.उत्तर भारत के व्यंजनों का स्वरूप बदलता ही जा रहा है

प्रश्न 3
खान पान के मामले में स्वाधीनता का क्या अर्थ है?
उत्तर-
खानपान के मामले में स्वाधीनता का अर्थ है किसी विशेष स्थान के खाने-पीने का विशेष व्यंजन। जिसकी प्रसिद्धि दूर दूर तक हो। जैसे कि मुंबई की पाव भाजी, दिल्ली के छोले कुलचे, मथुरा के पेड़े व आगरे के पेठे, नमकीन आदि। पहले स्थानीय व्यंजनों का प्रचलन था। हर प्रदेश में किसी न किसी विशेष स्थान का कोई-न-कोई व्यंजन अवश्य प्रसिद्ध होता था। भले ही ये चीजें आज देश के किसी कोने में मिल जाएँगी लेकिन ये शहर वर्षों से इन चीजों के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन आज खानपान की मिश्रित संस्कृति ने लोगों को खाने-पीने के व्यंजनों में इतने विकल्प दे दिए हैं कि स्थानीय व्यंजन प्रायः लुप्त होते जा रहे हैं।


निबंध से आगे

प्रश्न 1
घर से बातचीत करके पता कीजिए कि आपके घर में क्या चीजें पकती हैं और क्या चीजें बनी-बनाई बाज़ार से आती हैं। इनमें से बाज़ार से आनेवाली कौन-सी चीजें आपके-माँ-पिता जी के बचपन में घर में बनती थीं?
उत्तर - विद्यार्थी स्वयं करें।
प्रश्न 2.
यहाँ खाने पकाने और स्वाद से संबंधित कुछ शब्द दिए गए हैं। इन्हें ध्यान से देखिए और उनका वर्गीकरण कीजिए- 















प्रश्न 3.
छौंक चावल कढ़ी
• इन शब्दों में क्या अंतर है? समझाइए। इन्हें बनाने के तरीके विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग हैं। पता करें कि आपके प्रांत में इन्हें कैसे बनाया जाता है।
उत्तर - 
विद्यार्थी स्वयं अभिभावक की सहायता से करें।
प्रश्न 4.
पिछली शताब्दी में खानपान की बदलती हुई तसवीर का खाका खींचें तो इस प्रकार होगा-
सन् साठ का देशक – छोले-भटूरे
सन् सत्तर का दशक – इडली, डोसा
सन् अस्सी का दशक – तिब्बती (चीनी) भोजन
सन् नब्बे का दशक – पीजा, पाव-भाजी
• इसी प्रकार आप कुछ कपड़ों या पोशाकों की बदलती तसवीर का खाका खींचिए।






भाषा की बात
प्रश्न 1.
खानपान शब्द खान और पान दो शब्दों को जोड़कर बना है। खानपान शब्द में और छिपा हुआ है। जिन शब्दों के योग में और, अथवा, या जैसे योजक शब्द छिपे हों, उन्हें द्वंद्व समास कहते हैं। नीचे द्वंद्व समास के कुछ उदाहरण दिए गए हैं। इनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए और अर्थ समझिए- 
सीना-पिरोना
लंबा-चौड़ा भला-बुरा
कहा-सुनी चलना-फिरना
घास-फूस

उत्तर-
सीना-पिरोना – नेहा सीने-पिरोने की कला में काफ़ी अनुभवी है।
भला-बुरा – मैंने उसे भला-बुरा कहा।
चलना-फिरना – चलना-फिरना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
लंबा-चौड़ा – धनीराम का व्यापार लंबा-चौड़ा है।
कहा-सुनी – सास-बहू में खूब कहा-सुनी हो गई।
घास-फूस – उसका घर घास-फूस का बना है।

प्रश्न 2.
कई बार एक शब्द सुनने या पढ़ने पर कोई और शब्द याद आ जाता है। आइए शब्दों की ऐसी कड़ी बनाएँ। नीचे शुरुआत की गई है। उसे आप आगे बढाइए। कक्षा में मौखिक सामूहिक गतिविधि के रूप में भी इसे दिया जा सकता है
इडली – दक्षिण – केरल – ओणम् – त्योहार – छुट्टी – आराम
उत्तर- 
आराम – कुर्सी, तरणताल – नहाना, नटखट – बालक, चंचल – बालिका।

  

NCERT Solutions for Class 7 Hindi Chapter 8   रहीम के दोहे

हिन्दी (वसंत)
कक्षा - 7
अध्याय - 8

रहीम के दोहे 

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
दोहे से

प्रश्न 1.
पाठ में दिए गए दोहों की कोई पंक्ति कथन है और कोई कथन को प्रमाणित करनेवाला उदाहरण। इन दोनों प्रकार की पंक्तियों को पहचान कर अलग-अलग लिखिए। .
उत्तर - 
दोहों में वर्णित निम्न पंक्ति कथन हैं-
1.कहि रहीम संपति सगे, बनते बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत।।1।।
कठिन समय में जो मित्र हमारी सहायता करता है, वही हमारा सच्चा मित्र होता है।

2.जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।।
रहिमन मछरी नीर को, तऊ न छाँड़ति छोह।। 2।।
मछली जल से अपार प्रेम करती है इसीलिए उससे बिछुड़ते ही अपने प्राण त्याग देती है।
निम्न पंक्तियों में कथन को प्रमाणित करने के उदाहरण हैं-

1. तरुवर फल नहिं खात है, सरवर पियत न पान।
कहि रहीम परकाज हित, संपति-सचहिं सुजान।।3।।
निस्वार्थ भावना से दूसरों का हित करना चाहिए, जैसे-पेड़ अपने फल नहीं खाते, सरोवर अपना जल नहीं पीते और सज्जन धन संचय अपने लिए नहीं करते।

2. थोथे बाद क्वार के, ज्यों रहीम घहरात।
धनी पुरुष निर्धन भए, करें पाछिली बात।।4।।

कई लोग गरीब होने पर भी दिखावे हेतु अपनी अमीरी की बातें करते रहते हैं, जैसे-आश्विन के महीने में बादल केवल गहराते हैं बरसते नहीं।

3. धरती की-सी रीत है, सीत घाम औ मेह।
जैसी परे सो सहि रहे, त्यों रहीम यह देह।।5।।
मनुष्य को सुख-दुख समान रूप से सहने की शक्ति रखनी चाहिए, जैसे-धरती सर्दी , गर्मी व बरसात सभी मौसम समान रूप से सहती है।
कविता से आगे
नीचे दिए गए दोहों में बताई गई सच्चाइयों को यदि हम अपने जीवन में उतार लें तो उसके क्या लाभ होंगे? सोचिए
और लिखिए
(क) तरुवर फल ……..
……………. संचहिं सुजान।

(ख) धरती की-सी ………….
……. यह देह॥
उत्तर-
(क) इस दोहे के माध्यम से रहीम यह बताने का प्रयास कर रहे हैं कि वृक्ष अपने फल नहीं खाते और सरोवर अपना जल नहीं पीते उसी प्रकार सज्जन अपना संचित धन अपने लाभ के लिए उपयोग नहीं करते। उनका धन दूसरों की भलाई में खर्च होता है। यदि हम इस सच्चाई को अपने जीवन में उतार लें, अर्थात् अपना लें तो अवश्य ही समाज का कल्याणकारी रूप हमारे सामने आएगा और राष्ट्र सुंदर रूप से विकसित होगा।

(ख) इस दोहे के माध्यम से रहीम बताने का प्रयास कर रहे हैं कि मनुष्य को धरती की भाँति सहनशील होना चाहिए। यदि हम सत्य को अपनाएँ तो हम जीवन में आने वाले सुख-दुख को सहज रूप से स्वीकार कर सकेंगे। अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं होंगे। हम हर स्थिति में संतुष्ट रहेंगे। हमारे मन में संतोष की भावना आएगी।


भाषा की बात
प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के प्रचलित हिंदी रूप लिखिए-
जैसे-परे-पड़े (रे, डे)
बिपति बादर
मछरी सीत
उत्तर - 
रहीम की भाषा हिंदी के शब्द
बिपति – विपत्ति
मछरी – मछली
बादर – बादल
सीत – शीत

प्रश्न 2.
नीचे दिए उदाहरण पढ़िए
(क) बनत बहुत बहु रीत।।
(ख) जाल परे जल जात बहि।
उपर्युक्त उदाहरणों की पहली पंक्ति में ‘ब’ का प्रयोग कई बार किया गया है और दूसरी में ‘ज’ का प्रयोग, इस प्रकार बार-बार एक ध्वनि के आने से भाषा की सुंदरता बढ़ जाती है। वाक्य रचना की इस विशेषता के अन्य उदाहरण खोजकर लिखिए।
उत्तर-
(क) दाबे व दबे
(ख) संपति-सचहिं सुजान।।
(ग) चारू चंद्र की चंचल किरणें (‘च’ वर्ण की आवृत्ति)
(घ) तर तमाल तरुवर बहु छाए। (‘त’ वर्ण की आवृत्ति)
(ङ) रघुपति राघव राजा राम (‘र’ वर्ण की आवृत्ति)

 

मणिका
कक्षा - 9
एकादशः पाठः

भारतेनास्ति मे जीवनं जीवनम्





 

मणिका
कक्षा - 9
दशम: पाठः

भारतीयं विज्ञानम् 






 

मणिका
कक्षा - 9
नवमः पाठः

कवयामि वयामि यामि






मणिका
कक्षा - 9
नवमः पाठ:

न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्ष्यते 





 

 

ERT Solutions for Class 7 Hindi Chapter  अपूर्व अनुभव

हिन्दी (वसंत)
कक्षा - 7
अध्याय - 7

अपूर्व अनुभव

पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास

पाठ से
प्रश्न 1.
यासुकी-चान को अपने पेड़ पर चढ़ाने के लिए तोत्तो-चान ने अथक प्रयास क्यों किया? लिखिए।

उत्तर-
यासुकी-चान तोत्तो-चान का प्रिय मित्र था। वह पोलियोग्रस्त था, इसलिए वह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता था, जबकि जापान के शहर तोमोए में हर बच्चे का एक निजी पेड़ था, लेकिन यासुकी-चान ने शारीरिक अपंगता के कारण किसी पेड़ को निजी नहीं बनाया था। तोत्तो-चान की अपनी इच्छा थी कि वह यासुकी-चान को अपने पेड़ पर आमंत्रित कर दुनिया की सारी चीजें दिखाए। यही कारण था कि उसने यासुकी-चान को अपने पेड़ पर चढ़ाने के लिए अथक प्रयास किया।

प्रश्न 2.
दृढ़ निश्चय और अथक परिश्रम से सफलता पाने के बाद तोत्तो-चान और यासुकी-चान को अपूर्व अनुभव मिला, इन दोनों के अपूर्व अनुभव कुछ अलग-अलग थे। दोनों में क्या अंतर रहे? लिखिए।
 
उत्तर
दृढ़ निश्चय और अथक परिश्रम से पेड़ पर चढ़ने की सफलता पाने के बाद तोत्तो-चान और यासुकीचान को अपूर्व अनुभव मिला। इन दोनों के अपूर्व अनुभव का अंतर निम्न रूप में कह सकते हैं-

तोत्तो-चान-तोत्तो-चान स्वयं तो रोज़ ही अपने निजी पेड़ पर चढ़ती थी। लेकिन पोलियो से ग्रस्त अपने मित्र यासुकी-चान को पेड़ की द्विशाखा तक पहुँचाने से उसे अपूर्व आत्म-संतुष्टि व खुशी प्राप्त हुई क्योंकि उसके इस जोखिम भरे कार्य से यासुकी-चान को अत्यधिक प्रसन्नता मिली। मित्र को प्रसन्न करने में ही वह प्रसन्न थी।

यासुकी-चान-यासुकी-चान को पेड़ पर चढ़कर अपूर्व खुशी मिली। उसके मन की चाह पूरी हो गई। पेड़ पर चढ़ना तो दूर वह तो निजी पेड़ बनाने के लिए भी शारीरिक रूप से सक्षम न था। उसे ऐसा सुख पहले कभी न मिला था।

प्रश्न 3.

पाठ में खोजकर देखिए-कब सूरज का ताप यासुकी-चान और तोत्तो-चान पर पड़ रहा था, वे दोनों पसीने से तरबतर हो रहे थे और कब बादल का एक टुकड़ा उन्हें छाया देकर कड़कती धूप से बचाने लगा था। आपके अनुसार, इस प्रकार परिस्थिति के बदलने का कारण क्या हो सकता है?

उत्तर-
पहली सीढ़ी से यासुकी-चान का पेड़ पर चढ़ने का प्रयास जब असफल हो जाता है तो तोत्तो-चान तिपाई-सीढी खींचकर लाई। अपने अथक प्रयास से उसे ऊपर चढ़ाने का प्रयास करने लगी तो दोनों तेज़ धूप में पसीने से तरबतर हो रहे थे। दोनों के इस अथक संघर्ष के बीच बादल का एक टुकड़ा छायाकर उन्हें कड़कती धूप से बचाने लगा। उन दोनों की मदद के लिए वहाँ कोई नहीं था। संभवतः इसीलिए प्रकृति को उन दोनों पर दया आ गई थी और थोड़ी खुशी और राहत देन का कोशिश कर रहा था।

प्रश्न 4.
‘यासुकी-चान के लिए पेड़ पर चढ़ने का यह………अंतिम मौका था।’ इस अधूरे वाक्य को पूरा कीजिए और लिखकर बताइए कि लेखिका ने ऐसा क्यों लिखा होगा?

उत्तर-
‘यासुकी-चान के लिए पेड़ पर चढ़ने का यह अंतिम मौका था’ लेखिका ने ऐसा इसलिए लिखा क्योंकि यासुकी-चान पोलियो ग्रस्त था। उसके लिए पेड़ पर चढ़ जाना असंभव था। उसे आगे तोत्तो-चान जैसा मित्र मिल पाना मुश्किल था। तोत्तो-चान के अथक परिश्रम और साहस के बदौलत वह पहली बार पेड़ पर चढ़ पाया था। यह अवसर मिलना और कभी असंभव था। अगर उनके माता-पिता को इसकी जानकारी मिल जाती तो कभी यह काम करने नहीं देते। शायद दोबारा ऐसा कभी नहीं कर पाते।

पाठ से आगे

प्रश्न 1.
तोत्तो-चान ने अपनी योजना को बड़ों से इसलिए छिपा लिया कि उसमें जोखिम था, यासुकी-चान के गिर जाने की संभावना थी। फिर भी उसके मन में यासुकी-चान को पेड़ पर चढ़ाने की इच्छा थी। ऐसी दृढ़ इच्छाएँ बुधि और कठोर परिश्रम से अवश्य पूरी हो जाती हैं। आप किस तरह की सफलता के लिए तीव्र इच्छा और वृद्धि का उपयोग कर कठोर परिश्रम करना चाहते हैं?

उत्तर-
किसी भी काम में सफलता पाने के लिए तीव्र इच्छा, लगन, कठोर परिश्रम, की आवश्यकता होती है। छात्र परीक्षा में उच्च कोटि की सफलता प्राप्त करने के लिए इनका उपयोग करें तथा छात्र स्वयं अपने-अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं। कक्षा में चर्चा करेंगे।

प्रश्न 2.
हम अकसर बहादुरी के बड़े-बड़े कारनामों के बारे में सुनते रहते हैं, लेकिन ‘अपूर्व अनुभव’, कहानी एक मामूली बहादुरी और जोखिम की ओर हमारा ध्यान खींचती है। यदि आपको अपने आसपास के संसार में कोई रोमांचकारी अनुभव प्राप्त करना हो तो कैसे प्राप्त करेंगे?

उत्तर
विद्यार्थियों द्वारा स्वयं किए जाने वाला प्रश्न है। कक्षा में चर्चा करेंगे।

अनुमान और कल्पना

प्रश्न 1.
अपनी माँ से झूठ बोलते समय तोत्तो-चाने की नज़रें नीचे क्यों थीं?  

उत्तर
तोत्तो-चान ने यासुकी-चान को अपने पेड़ पर आमंत्रित किया था। यह बात उसने अपनी माँ से छिपाई थी क्योंकि उसे मालूम था कि माँ यह जोखिम भरा कार्य नहीं करने देगी। जब माँ ने उससे पूछा कि वह कहाँ जा रही है तो उसने झूठ कहा कि वह यासुकी-चान से मिलने उसके घर जा रही है। यह कहते समय उसकी नज़रें नीची थीं क्योंकि वह माँ से झूठ बोल रही थी। उसे डर था कि शायद वह माँ से नजरें मिलाकर जब यह बात कहेगी तो उसका झूठ पकड़ा जाएगा।

प्रश्न 2.
यासुकी-चान जैसे शारीरिक चुनौतियों से गुजरने वाले व्यक्तियों के लिए चढ़ने-उतरने की सुविधाएँ हर जगह नहीं होतीं। लेकिन कुछ जगहों पर ऐसी सुविधाएँ दिखाई देती हैं। उन सुविधा वाली जगहों की सूची बनाइए।

उत्तर-
विद्यालयों मैं अपंग बच्चों के लिए रेप बना रखे हैं। मैट्रो रेल में भी अपंगों को चढ़ने-उतरने के लिए विशेष प्रकार की लिफ्ट लगा रखी है। अस्पतालों में व्हील चेयर होती है। हवाई अड्डों पर भी यह सुविधा उपलब्ध है।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
विशाखा शब्द दिव और शाखा के योग से बना है। दिव का अर्थ है-दो और शाखा का अर्थ है-डाल। विशाखा पेड़ के तने का वह भाग है जहाँ से दो मोटी-मोटी डालियाँ एक साथ निकलती है। वि की भाँति आप त्रि से बनने वाला शब्द त्रिकोण जानते होंगे। ‘त्रि’ का अर्थ होता है तीन। इस प्रकार चार, पाँच, छह, सात, आठ, नौ और संख्यावाची संस्कृत शब्द उपयोग में अक्सर आते हैं। इन संख्यावाची शब्दों की जानकारी प्राप्त कीजिए और देखिए कि वह क्या इन शब्दों की ध्वनियाँ अंग्रेज़ी संख्या के नामों से कुछ-कुछ मिलती-जुलती हैं, जैसे- हिंदी-आठ संस्कृति-अष्ट, अंग्रेज़ी एट।

उत्तर-

हिंदी संस्कृत अंग्रेजी
दोद्विदू
तीनत्रिथ्री
पाँचपंचफाइव
छहषष्टसिक्स
सातसप्तसेवन
नौनवनाइन

प्रश्न 2.
पाठ में ‘ठिठियाकर हँसने लगी’, ‘पीछे से धकियाने लगी’ जैसे वाक्य आए हैं। ठिठियाकर हँसने के मतलब का आप अवश्य अनुमान लगा सकते हैं। ठी-ठी-ठी हँसना या ठठा मारकर हँसना बोलचाल में प्रयोग होता है। इनमें हँसने की ध्वनि के एक खास अंदाज को हँसी का विशेषण बना दिया गया है। साथ ही ठिठियाना और धकियाना शब्द में ‘आना’ प्रत्यय का प्रयोग हुआ है। इस प्रत्यय से फ़िल्माना शब्द भी बन जाता है। ‘आना’ प्रत्यय से बननेवाले चार सार्थक शब्द लिखिए।

उत्तर
घराना, चलाना, जुर्माना, रोजाना, शर्माना।